अलविदा प्रणब दाः हर तरफ शोक की लहर, सात दिवसीय राजकीय शोक घोषित

 




नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में हर तबके और पक्ष-विपक्ष में सभी के सम्मानित नेता रहे भारत रत्न पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (प्रणब दा) के निधन की खबर मिलते ही हर तरफ शोक की लहर दौड़ गई। वे 84 वर्ष के थे।दिल्ली कैंट स्थित आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में उनका इलाज किया जा रहा था। आज सुबह ही अस्पताल की तरफ से बताया गया था कि फेफड़ों में संक्रमण की वजह से वह सेप्टिक शॉक में थे। मुखर्जी के निधन पर भारत सरकार ने 31 अगस्त से छह सितंबर तक सात दिवसीय राजकीय शोक घोषित किया है। 


84 वर्षीय मुखर्जी लगातार गहरे कोमा में थे और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था। सेप्टिक शॉक की स्थिति में रक्तचाप काम करना बंद कर देता है और शरीर के अंग पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त करने में विफल हो जाते हैं। उन्हें 10 अगस्त को दिल्ली कैंट स्थित सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इससे पहले उनकी कोरोना रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई थी। मुखर्जी के मस्तिष्क में खून के थक्के जमने के बाद उनका ऑपरेशन किया गया था। अस्पताल में भर्ती कराए जाने के समय वह कोविड-19 से भी संक्रमित पाए गए थे। इसके बाद उन्हें श्वास संबंधी संक्रमण हो गया था। मुखर्जी भारत के 13वें राष्ट्रपति के रूप में वर्ष 2012 से 2017 तक पद पर रहे। पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी के परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं।


प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले के मिराती नामक गांव में हुआ था। उनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी एक स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के नेता थे और उनकी माता राजलक्ष्मी मुखर्जी एक गृहणी। प्रणब दा शुरू से ही पढ़ाई में तेज थे और जिले के सुरी विद्यासागर कॉलेज से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए और कानून की पढाई (एलएलबी) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कलकत्ता में ही पोस्ट एंड टेलिग्राफ विभाग में अपर डिविजन क्लर्क की नौकरी शुरू की। इसके बाद उन्होंने 1963 में पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में स्थित विद्यानगर कॉलेज में कुछ वक्त तक बतौर शिक्षक राजनीति शास्त्र भी पढ़ाया। इतना ही नहीं उन्होंने एक समाचार पत्र में बतौर पत्रकार भी काम किया।


राजनीति की शुरुआत
प्रणब मुखर्जी ने 1969 में मिदनापुर उपचुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार वीके कृष्ण मेनन के लिए चुनाव प्रचार किया और यहां से उनकी दिलचस्पी राजनीति में बढ़ने लगी। उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उस उपचुनाव में प्रणब मुखर्जी के चुनावी और रणनीतिक कौशल से बेहद प्रभावित हुईं और उन्हें कांग्रेस पार्टी का सदस्य बना दिया। इसके बाद उसी साल जुलाई में मुखर्जी को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेज दिया।
पहली बार राज्यसभा पहुंचे और मंत्री पद संभाला
इंदिरा गांधी की बदौलत प्रणब मुखर्जी 1969 में कांग्रेस की तरफ से पहली बार राज्यसभा पहुंचे। फरवरी 1973 से जनवरी 1974 तक वह औद्योगिक विकास
मंत्री रहे। इसके बाद जनवरी 1974 से अक्टूबर 1974 तक वह जहाजरानी और परिवहन मंत्री के पद पर रहे। अक्टूबर 1974 से दिसंबर 1975 तक वह वित्त राज्य मंत्री रहे।


पांच बार पहुंचे राज्यसभा
जुलाई 1975 में वह दूसरी बार राज्यसभा के लिए चुने गए। दिसंबर 1975 से मार्च 1977 तक वह राजस्व और बैंकिंग मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने रहे। साल 1978 से 1980 तक वह राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के उप नेता रहे। वे कई वर्षों तक कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य रहे और पार्टी के विभिन्न पदों का जिम्मा भी संभाला। पार्टी में कई अहम पदों के साथ ही उन्होंने कई मंत्रालयों का भार भी संभाला। इसके बाद अगस्त 1981 में वह तीसरी बार राज्यसभा सदस्य चुने गए। इसके बाद 1993 में चैथी और 1999 में पांचवीं बार राज्यसभा के लिए चुने गए।


कई मंत्रालय संभालते हुए राष्ट्रपति पद पर पहुंचे
प्रणब दा ने विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर अपनी भूमिका निभाई। प्रणब दा ने 25 जून 2012 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया और 2012 से 2017 तक भारत के 13वीं राष्ट्रपति रहे।



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