पर्यावरण डिटर्जेंट प्रदूषक का पता लगाने को पहला विशिष्ट जीवाणु बायोसेंसर विकसित किया

रुड़की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के शोधकर्ताओं की एक पांच सदस्यीय टीम ने सामान्य पर्यावरण प्रदूषक-सोडियम डोडेसिल सल्फेट सोडियम लॉरिल सल्फेट (एसडीएस) की उपस्थिति का पता लगाने के लिए दुनिया का पहला एवं विश्वसनीय बैक्टीरिया बायोसेंसर विकसित किया है। एसडीएस का उपयोग मुख्य रूप से साबुन, टूथपेस्ट, क्रीम, शैंपू, घरों में कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट, कृषि कार्यों, प्रयोगशालाओं और उद्योगों में किया जाता है। बाद में विभिन्न जलाशयों तथा जल-श्रोतों में इसके प्रवाह से जलीय जीवों, पर्यावरणीय सूक्ष्मजीवों और संबंधित जीवों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। साथ ही इससे पीने के पानी की गुणवत्ता खराब होती है। इस शोध का उद्देश्य सोडियम डोडेसिल सल्फेट ध् सोडियम लॉरिल सल्फेट (एसडीएस) की पहचान के लिए एक उपयुक्त बायोसेंसर विकसित करना था।
 अभी तक एसडीएस की स्पष्ट उपस्थिति का पता लगाने के लिए कोई विशिष्ट बायोसेंसर विकसित नहीं हुआ था। आईआईटी रुड़की की टीम ने स्यूडोमोनस एरुगिनोसा पीएओ1 स्ट्रेन को एक फ्रेमवर्क के रूप में उपयोग करते हुए एक होल-सेल बायोसेंसर विकसित किया है। इस सिस्टम में एक विशिष्ट रेगुलेटर के साथ एक फ्लोरोसेंट प्रोटीन शामिल है, जिसका उत्पादन केवल तब होता है जब नमूने में एसडीएस मौजूद हो। सिस्टम जलीय नमूनों में एसडीएस के 0.1 पीपीएम की उपस्थिति का भी पता लगाने में सक्षम है। यह बायोसेंसर विशिष्ट रूप से एसडीएस के लिए है और इसमें पर्यावरण में मौजूद अन्य डिटर्जेंट, धातुओं और अकार्बनिक आयनों का हस्तक्षेप न्यूनतम है। पारंपरिक तरीकों के विपरीत, यह नजदीकी रूप से जुड़े डिटर्जेंट- एसडीएस और एसडीबीएस (सोडियम डोडिसाइल बेंजीन सल्फोनेट) के बीच आसानी से अंतर कर सकता है। “स्यूडोमोनॉड्स में सिंथेटिक जीवविज्ञान अनुप्रयोगों के लिए एक ऑप्टीमल डेस्टिनेशन फ्रेमवर्क के रूप में उपयोग किये जाने की अंतर्निहित क्षमता है। स्यूडोमोनास की चयनित प्रजातियों को विभिन्न रसायनों का पता लगाने के लिए इंजीनियर किया जा सकता है, क्योंकि उनमें विपरीत पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी जीवित रहने क्षमता होती है। इस शोध का मुख्य आकर्षण एसडीएस के प्रत्यक्ष, विशिष्ट और स्पष्ट पहचान के लिए दुनिया के पहले होल-सेल बैक्टीरिया बायोसेंसर का विकास है, जिसमें पहचान नमूने की तैयारी, विषैले रसायन, परिष्कृत पॉलिमर और सेंसर विकास के चरण को शामिल किए बिना किया जाता है,” सॉरिक डे, आईआईटी रुड़की में एमएससी के अंतिम वर्ष के छात्र, ने कहा।
अगर एसडीएस का समुचित उपचार नहीं किया जाता है, तो यह समुद्री जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकता है और भूमि तथा जल-निकायों के प्रदूषण का कारण बन सकता है। इस बायोसेंसर की मुख्य विशेषता पर्यावरण में एसडीएस की न्यूनतम मात्रा में उपस्थिति को लेकर भी संवेदनशील होना और एसडीएस तथा एसडीबीएस के बीच अंतर करने की सक्षम होना है।


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