Thursday, 26 November 2020

निश्छल प्रेम के बदले में परमात्मा भी कुछ नहीं दे सकता: मोरारीबापू

रमन रेती में कार्ष्णि गुरु शरणानंदजी महाराज के सानिध्य में चल रही रामकथा के सातवें दिन प्रारंभ में योग ऋषि पूज्य रामदेवजी बाबा ने निश्छल हृदय से अपना वेद, वेदना और वंदना तीनों मोरारीबापू के चरणों में रख दिया। कृतार्थ और कृतज्ञ भाव से उद्बोधन करके सबको आनंदित कर दिया। कथा के प्रारंभ में बापू ने महाराज श्री को ब्रजमंडल के नंदबाबा कहकर उनकी भाव-वंदना की। रामदेवजी बाबा को वैश्विक योग-संचार का केन्द्र बताकर कहा कि आपने सबका योग करवाया है, किसी का वियोग नहीं करवाया। योग गुरु ने पचास साल में डेढ़ सौ साल का काम किया, जगत कर्ज़मंद रहेगा ऐसा कहकर बापू ने साधुवाद दिया। बापू ने कहा, मैं स्वदेशी चीजों का इस्तेमाल करता हूं। निष्केवल प्रेम के बदले में परमात्मा भी कुछ नहीं दे सकता। इस बात को स्पष्ट करते हुए बापू ने कहा कि राम राज्य की स्थापना के बाद भगवान ने कौल-कीरातों के लिए क्या किया? मीरां के लिए गोविंद ने क्या किया? प्रेम का अंतिम चरण है विगलित हो जाना। ऐसे प्रेमियों को बदले में कुछ देने की चेष्टा अपमान है। रामचरितमानस पूर्णतः समर्पण का शास्त्र है। रामायण के आदि को सत्य, मध्य को प्रेम और अंत को करुणा कहा। सत्य से जो संतान प्रकट होती है उसका नाम है अभय। जहां सत्य होता है वहां अभय होता ही है। प्रेम से जो संतान प्रकट होती है वह है त्याग। प्रेम आएगा तो समर्पण आएगा ही। 'केवल मुक्ति', 'केवल ज्ञान', 'केवल निर्वाण' की चर्चा ग्रंथों में मिलती हैं पर 'मानस' में प्रधान रूप से 'केवल प्रेम' की चर्चा है। प्रेम की कुछ श्रेणियां बताते हुए कहा की प्रेम लाक्षावत्, घृतवत् और मधुवत् होता हैं। अब, प्रेमधारा के कुछ प्रतिबंधक तत्वों की चर्चा करते हुए बापू ने कहा, आशाबंध प्रेम का प्रतिबंधक तत्त्व है। आशा एक ठाकुर जी से ही होनी चाहिए। तू ना मिले तो कोई चिंता नहीं, तेरा प्यार मिले। प्रेमधारा का दूसरा प्रतिबंधक तत्व है - उद्वेग। प्रेमी को उद्वेग कैसा! प्रेम करने वाले पर बहुत कष्ट आएंगे। पर आखिरी क्षण तक टिके रहना वो तो गुरु कृपा से ही संभव है। दुःख के लम्हों में उद्वेग नहीं करना चाहिए क्योंकि हमारे पास महाभारत, रामायण, वेद, उपनिषद, दर्शनशास्त्र, संत-आचार्य सब का संबल हैं। प्रेमधारा का साधक तत्व है समुत्कंठा। रोज परमार्थ की नई और स्वादु उत्कंठा जगे। और प्रेम धारा का दूसरा साधक तत्व है -सहज विरक्ति। विरक्तों का प्रेम शाश्वती लिए बहता है। क्योंकि उनका प्रेम कामना रहित, गुण रहित और प्रतिक्षण वर्धमान होता है। मानशून्यता, प्रेम का तीसरा साधक तत्व है। इसमें प्रेमी कोई सम्मान नहीं चाहता। चौथा साधक तत्व है - व्यर्थकालत्वम्। इसमें स्वधर्म निभाते हुए शेष समय में थोड़ा हरि भजन करें। काल को व्यर्थ न गवाएं। परमात्मा के नाम में,धाम में, भगवद् चरित्र में हमारी रुचि बढ़े तो समझना कि प्रेम प्रवाह बढ़ रहा है। कोरोना के संदर्भ में बापू ने कहा कि जब तक वैक्सिन न आ जाए तब तक मास्क ही वैक्सीन है। ऐसा कहकर सबको सावधानी बरतने को कहा। इन चर्चाओं के साथ बापू ने कथा को विराम दिया।

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