Tuesday, 15 June 2021

भारत में अब और वृद्धाश्रम न खुलेः स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। सम्पूर्ण विश्व में वृद्धजनों के प्रति सम्मान और सुरक्षा बनाये रखने, अन्याय को समाप्त करने के लिए तथा बुजुर्ग के साथ हो रहेेे दुर्व्यवहार के प्रति जागरूकता करने हेतु अन्तर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि वृद्धों की देखभाल करना एक वैश्विक मुद्दा नहीं बल्कि मानवाधिकारों की रक्षा और भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। कोविड-19 के इस दौर में वृद्धजनों को सुरक्षा और सहायता की और अधिक आवश्यकता है। वृद्धजनों को इस समय न केवल वायरस का खतरा है बल्कि जीवन, सुरक्षा के साथ उनका काफी हद तक सामाजिक नेटवर्क समाप्त हो गया है तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच पहले जैसी नहीं रही इसलिये इस समय उन्हें अतिरिक्त सहायता की जरूरत है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि वृद्धजनोँ कोे भरण-पोषण, भोजन, कपड़ा, आवास, चिकित्सीय सहायता और उपचार, स्वास्थ्य देखभाल, बचाव, सुरक्षा के साथ प्रेमयुक्त गरिमापूर्ण जीवन देना जरूरी है। वृद्धजनों को एक सम्मानजनक जीवन देना परिवारवालों के साथ-साथ समाज की भी जिम्मेदारी है। स्वामी जी ने कहा कि रोजगार और काम के संबंध में युवा अपने मूल स्थान से बाहर जाते हैं तथा बेहतर विकल्पों की तलाश कर रहें हैं ऐसे में परिवार के वृद्ध सदस्यों को साथ ले जाना संभव नहीं हो पाता है जिसके कारण वे वृद्धजन अपने मूल स्थान या फिर स्वदेश में रहकर एकांत में जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं साथ ही वे अकेलेपन के शिकार भी हो जाते हैं परन्तु कोरोना महामारी के कारण शहरों से लोग अपने गांवों को लौटने लगे ऐेसे में कई वृद्धजनों का अकेलापन दूर हुआ और उन्हें परिवारवालों का साथ भी मिल रहा है। स्वामी जी ने कहा कि वृद्ध होने पर वे पूरी तरह से अपने परिवार पर निर्भर हो जाते हैं। कई बार उत्तम सुविधाओं तथा अच्छी देखभाल के बावजूद भी उनके जीवन में अकेलापन रहता है, जिससे तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उम्र के इस पड़ाव पर इंसान को अधिक देखभाल, प्यार और साथ की आवश्यकता होती है, परन्तु वर्तमान की रोजगार व्यवस्था, बदलती जीवन शैली, बदलती सामाजिक व्यवस्था तथा अन्य कारणों से बुजुर्गों एवं युवाओं के मध्य एक खाई गहरी होती जा रही है। स्वामी जी ने कहा कि समाज की वृद्धजन रूपी अमूल्य धरोहर को सहेजने के लिये हमें अपने बच्चों को संस्कार युक्त जीवन, अपनी जड़ों से जुड़ना, अपने मूल्यों को आत्मसात करना तथा सामाजिक व्यवस्था के सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करने की नितांत आवश्यकता है क्योंकि जो आज युवा है भविष्य में इन बुजुर्गों का स्थान वे ही लेने वाले हैं। आईये संकल्प लें कि वृद्धों के साथ दुर्व्यवहार न करें तथा भारत में अब और वृद्धाश्रम न खुले।

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