सगंध पौधों की खेती से बदल सकती किसानों की तकदीर

देहरादून। परंपरागत खेती के बजाए यदि किसान सगंध पौधों की खेती करें तो उनकी तकदीर बदल सकती है। सगंध पौधों की खेती के लिए न ज्यादा पानी की जरूरत होती है और न ही इसको जंगली जानवर नुकसान पहुंचाते हैं। सगंध पौधों की खेती लाभकारी साबित हो रही है, जिस कारण किसान इस ओर आकर्षित हो रहे हैं। ये किसान मुख्य रूप से लेमनग्रास, जपानी मिंट, रोज, कैमोमाइल, तेजपात, गेंदू, गुलाब, पामारोज, खस, डेमस्क, जिरेनियम, काला जीरा, तेजपत्ता, तिमूर, चंदन, कोमोमाइल, सिट्रोनेला, पामारोजा, तुलसी, गेंदा, जेरेनियम, स्याहजीरा, आर्टीमीशिया की खेती कर रहे हैं। सेलाकुई स्थित सगंध पौधा केंद्र (कैप) ने वर्ष 2004 में सगंध पौधों की खेती को लेकर 15 किसानों से जो पहल शुरू की थी, उसके उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं। मौजूदा समय में राज्य में लगभग 21 हजार किसान सगंध पौधों की खेती से जुड़ चुके हैं। 7652 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सगंध फसलों की खेती की जा रही है और सालाना टर्नओवर है 85 करोड़ है। इनमें सुदूर पर्वतीय क्षेत्र के सीमांत एवं लघु कृषक शामिल हैं तो मैदानी क्षेत्र के भी। विषम भौगोलिक परिस्थिति वाले उत्तराखंड में पलायन का असर खेती-किसानी पर भी पड़ा। अविभाजित उत्तर प्रदेश में यहां करीब आठ लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती थी और 2.66 लाख हेक्टेयर भूमि बंजर थी, लेकिन अब खेती का रकबा घटकर सात लाख हेक्टेयर पर आ गया। बंजर जमीन का रकबा बढ़कर 3.66 लाख हेक्टेयर हो गया। कैमोमाइल के फूल तो यूरोप तक जा रहे हैं। इसके फूलों को चाय बनाने में प्रयुक्त किया जाता है। सगंध पौधों की खेती बंजर भूमि पर आसानी से की जा सकती है। संगध पौधों को जानवर नहीं खाते। आसवन संयंत्र से संगध हर्ब को काफी मात्रा में परिवर्तित किया जा सकता है। कैरी करने में आसान, सड़नेे की भी समस्या नहीं होती। खेतों में हरियाली के साथ आर्थिक लाभ भी होता है। पर्वतीय क्षेत्र में गांवों से निरंतर हो रहे पलायन के कारण ज्यादातर खेत बंजर पडे़ हैं तो वन्यजीवों का आतंक, मौसम की बेरुखी, सिंचाई सुविधा का अभाव जैसे कारणों से भी लोग खेती से विमुख हुए हैं। इस परिदृश्य के बीच ऐसी खेती पर जोर दिया जा रहा था, जो इन सभी कारणों से निजात दिलाने के साथ ही पर्यावरण और किसान दोनों के लिए फायदेमंद हों। इसके विकल्प के रूप में आई सगंध खेती, जिसे बढ़ावा देने को सरकार ने प्रदेश में गठित किया सगंध पौधा केंद्र। इस केंद्र की ओर से किए गए प्रयासों के सार्थक परिणाम सामने आए हैं। यद्यपि, शुरुआती दौर में किसानों में सगंध खेती को लेकर हिचक थी, लेकिन धीरे-धीरे जब वे इसके लाभ से परिचित हुए तो इसमें उनकी रुचि भी बढ़ी। परिणामस्वरूप सगंध खेती का दायरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। सगंध पौधा केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में राज्य में 109 एरोमा क्लस्टर संचालित हो रहे हैं। ये क्लस्टर डेमस्क गुलाब, लैमनग्रास, तेजपात, मिंट समेत अन्य सगंध फसलों के हैं। कृषकों की सुविधा के लिए विभिन्न स्थानों पर 187 आसवन सयंत्र लगाए गए हैं। दरअसल, सगंध खेती की फसलें ऐसी हैं, जिन्हें बंजर भूमि में भी आसानी से उगाया जा सकता है और इनके लिए अधिक पानी की आवश्यकता भी नहीं होती। इन फसलों से प्राप्त सगंध तेल को बिक्री के लिए कहीं भी आसानी से ले जाया सकता है। यही नहीं, किसानों से यह तेल स्वयं सगंध पौधा केंद्र भी क्रय कर रहा है। इससे किसानों को पारंपरिक खेती की अपेक्षा कई गुना अधिक आमदनी भी हो रही है। इस सबको देखते हुए किसान अब सगंध खेती की तरफ अधिक रुचि लेने लगे हैं। प्रदेश में सगंध फसलों की खेती को बढ़ावा देने और किसानों को तकनीकी जानकारी देने के लिए पांच जिलों में सेटेलाइट केंद्र खोले जाने की दिशा में कार्य चल रहा है। इसके लिए सगंध पौध केंद्र सेलाकुई की ओर से सेटेलाइट केंद्र की योजना बनाई जा गई है। इन केंद्रों के खुलने से पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को बीज, पौध के अलावा सगंध खेती की जानकारी लेने के लिए देहरादून के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। चंपावत जिले के खतेड़ा में तेजपात, पिथौरागढ़ के बिसाड़ में तिमूर, उत्तरकाशी के रैथल में सुरई, चमोली के परसारी और अल्मोड़ा जिले के ताकुला में डेमस्क गुलाब का सेटेलाइट केंद्र खोला जाएगा। -

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