सगंध पौधों की खेती

परंपरागत खेती का बजाए सगंध पौधों की खेती करी तैं किसान अधिक लाभ अर्जित करी सकदन। सगंध पौधों की खेती मा लेमनग्रास, जपानी मिंट, रोज, कैमोमाइल, तेजपात, गेंदू, गुलाब, पामारोज, खस, डेमस्क, जिरेनियम, काला जीरा, तेजपत्ता, तिमूर, चंदन, कोमोमाइल, सिट्रोनेला, पामारोजा, तुलसी, गेंदा, जेरेनियम, स्याहजीरा, आर्टीमीशिया की खेती शामिल छ। सगंध पौधों की खेती तैं ज्यादा पाणी की जरूरत नी होंदी अर न ही यीं फसल तैं जंगली जानवर नुकसान पहुंचैंदन। हमारा पर्वतीय क्षेत्र मा सबसे बड़ी समस्या यही छ कि फसल तैं जंगली भारी नुकसान पहुंचैंदन, जै वजह सी कि लोगों तैं आर्थिक नुकसान उठौण पड़दू। जंगली जानवरों द्वारा खेती तैं नुकसान पहुंचाए जाणा का भय सी कई लोगून खेती कनू ही बंद करियाली। इना मा सगंध पौधों की खेती एक बेहतर विकल्प ह्वै सकदू। देहरादून जिला मा सहसपुर, विकासनगर क्षेत्र का किसान सगंध फसलों की खेती तैं सफलतापूर्वक कना छन। ऐ का अलावा राज्य का कुछ अन्य इलाकों मा भी सगंध फसलों की खेती होणी छ। य खेती लाभकारी साबित होणी छ, जै वजह सी कि किसान यीं ओर आकर्षित होणा छन। सेलाकुई स्थित सगंध पौधा केंद्र न वर्ष 2004 मा 15 किसानों का साथ सगंध पौधों की खेती शुरु करी थै, वर्तमान मा राज्य मा लगभग 21 हजार किसान सगंध पौधों की खेती सी जुड़ियां छन। राज्य मा 7652 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सगंध फसलों की खेती होणी छ। जै कू सालाना टर्नओवर कि 85 करोड़ छ। सगंध पौधों की खेती बंजर भूमि पर भी आसानी सी की जै सकदी। संगध पौधों तैं जानवर नी खांदन। आसवन संयंत्र सी संगध हर्ब तैं काफी मात्रा में परिवर्तित किये जै सकदू। ्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रफसलों सी प्राप्त सगंध तेल तैं बिक्री की खातिर कखी भी आसानी से ले जाये जै सकदू। किसानों से यू तेल स्वयं सगंध पौधा केंद्र भी क्रय कनू छ।

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